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पेट्रोल-डीजल कारें महंगी हो सकती हैं, हाइब्रिड और EV को मिलेगा फायदा; नई CAFE पॉलिसी का ड्राफ्ट जारी

📅 10 अगस्त 2026

नई दिल्ली, 09 अगस्त। भारत में नई कार खरीदने वाले ग्राहकों के लिए आने वाले समय में पेट्रोल, डीजल, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों की कीमतों और विकल्पों पर असर पड़ सकता है। केंद्र सरकार ने यात्री वाहनों के लिए नए कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी (CAFE) मानकों का ड्राफ्ट जारी किया है। प्रस्तावित नए नियम 1 अप्रैल 2027 से लागू किए जाने हैं।

नई नीति का मुख्य उद्देश्य वाहनों की ईंधन दक्षता बढ़ाना, पेट्रोलियम ईंधन की खपत कम करना और वाहनों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को घटाना है। इसके तहत कंपनियों के पूरे वाहन पोर्टफोलियो के औसत प्रदर्शन को ध्यान में रखा जाएगा।

इसका सबसे बड़ा असर ऑटो कंपनियों की मॉडल रणनीति पर पड़ सकता है। EV और हाइब्रिड जैसे कम उत्सर्जन वाले वाहनों को प्रोत्साहन मिलने से कंपनियों के लिए इन्हें बढ़ावा देना आसान होगा, जबकि ज्यादा उत्सर्जन वाले पेट्रोल-डीजल मॉडल कंपनियों के लिए महंगे पड़ सकते हैं।

EV और हाइब्रिड कारों को मिलेगा सुपर क्रेडिट

प्रस्तावित व्यवस्था में इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों को सुपर क्रेडिट देने का प्रावधान है। इसका मतलब है कि कुछ कम-उत्सर्जन वाले वाहनों की बिक्री को कंपनियों के CAFE अनुपालन की गणना में वास्तविक बिक्री से अधिक वजन दिया जाएगा।

ड्राफ्ट के अनुसार, एक इलेक्ट्रिक वाहन को गणना में 3 वाहनों के बराबर और एक हाइब्रिड वाहन को 1.6 वाहनों के बराबर माना जा सकता है।

इस व्यवस्था से कंपनियों को अपने औसत ईंधन खपत और उत्सर्जन लक्ष्य को पूरा करने में मदद मिलेगी। इसका फायदा ग्राहकों तक कम कीमत, बेहतर ऑफर या नए मॉडल के रूप में पहुंच सकता है, हालांकि EV या हाइब्रिड कारों की कीमत सीधे कम होना अनिवार्य नहीं है।

ज्यादा प्रदूषण वाली कारों पर बढ़ सकता है लागत का दबाव

नई व्यवस्था में ज्यादा उत्सर्जन वाले वाहनों का औसत कंपनियों के लिए चुनौती बन सकता है। यदि किसी कंपनी का प्रदर्शन निर्धारित मानकों से खराब रहता है, तो उसे अनुपालन के लिए अतिरिक्त क्रेडिट की जरूरत पड़ सकती है।

प्रस्तावित व्यवस्था में क्रेडिट की लागत उत्सर्जन के आधार पर तय हो सकती है। ऐसे में कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ने की स्थिति में ज्यादा उत्सर्जन वाले मॉडल की कीमत बढ़ाने का दबाव बन सकता है।

इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार सीधे पेट्रोल या डीजल कार पर जुर्माना लगाएगी। असर मुख्य रूप से ऑटो कंपनियों के CAFE अनुपालन और लागत के जरिए ग्राहकों तक पहुंच सकता है।

E85 और E100 फ्लेक्स-फ्यूल कारों को भी फायदा

प्रस्तावित नियमों में ज्यादा एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर चलने वाली फ्लेक्स-फ्यूल कारों को भी प्रोत्साहन देने का प्रावधान है।

E85 और E100 जैसे फ्लेक्स-फ्यूल वाहन 85 से 100 प्रतिशत तक एथेनॉल वाले ईंधन पर चलने के लिए तैयार किए जाते हैं। ड्राफ्ट में ऐसे वाहनों के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन का प्रावधान किया गया है।

इसके अलावा E20 ईंधन पर चलने वाली कारों को भी प्रस्तावित व्यवस्था में लाभ मिल सकता है, जिससे कंपनियों को उत्सर्जन और ईंधन दक्षता से जुड़े लक्ष्यों को पूरा करने में मदद मिलेगी।

कारों में नई तकनीक पर बढ़ेगा जोर

CAFE मानकों को पूरा करने के लिए कंपनियों को वाहनों की ईंधन दक्षता सुधारने वाली तकनीकों पर ज्यादा ध्यान देना होगा। इसके तहत बेहतर ट्रांसमिशन, टायर प्रेशर मॉनिटरिंग सिस्टम, LED लाइटिंग और दूसरी दक्षता बढ़ाने वाली तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ सकता है।

प्रस्तावित नियमों में 6-स्पीड या उससे अधिक गियर वाले ट्रांसमिशन को भी बढ़ावा दिए जाने की बात है। बेहतर गियर अनुपात इंजन को अधिक कुशल तरीके से चलाने में मदद कर सकता है।

इन तकनीकों के कारण नई कारों की निर्माण लागत बढ़ सकती है। हालांकि, इसका अंतिम असर मॉडल, तकनीक और कंपनी की रणनीति पर निर्भर करेगा।

माइलेज मापने का तरीका भी बदलेगा

नई व्यवस्था में भारत के मौजूदा MIDC परीक्षण चक्र से आगे बढ़कर WLTP जैसे वैश्विक परीक्षण मानकों की दिशा में जाने का प्रस्ताव है।

WLTP को अलग-अलग ड्राइविंग परिस्थितियों को ध्यान में रखकर वाहन के ईंधन या ऊर्जा उपयोग का आकलन करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इससे कागज पर बताए गए माइलेज और वास्तविक ड्राइविंग परिस्थितियों के बीच अंतर को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है।

कंपनियों की 'पासबुक' में दर्ज होगा प्रदर्शन

प्रस्तावित व्यवस्था में प्रत्येक कंपनी के प्रदर्शन का रिकॉर्ड रखने के लिए पासबुक जैसी व्यवस्था होगी। इसमें कंपनी के उत्सर्जन और ईंधन दक्षता से जुड़े क्रेडिट या डेबिट का हिसाब रखा जाएगा।

इसके साथ ही कंपनियों के बीच क्रेडिट पूलिंग का विकल्प भी प्रस्तावित है। यानी बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनी अपने अतिरिक्त क्रेडिट का इस्तेमाल दूसरी कंपनी के साथ साझा या हस्तांतरित करने की व्यवस्था का हिस्सा बन सकती है।

पुरानी कारों पर लागू नहीं होंगे नए नियम

प्रस्तावित CAFE नियमों का असर मुख्य रूप से 1 अप्रैल 2027 के बाद बनने या आयात होने वाले नए यात्री वाहनों पर होगा। मौजूदा पुरानी कारों पर इन मानकों के कारण सीधे कोई नया अनुपालन बोझ नहीं आएगा।

इसके अलावा सालाना 1,000 से कम यात्री वाहन बेचने वाली कंपनियों को प्रस्तावित व्यवस्था से छूट दिए जाने का प्रावधान है।

क्या डीजल कारें बंद हो जाएंगी?

नहीं। प्रस्तावित CAFE नियम डीजल कारों पर सीधे प्रतिबंध लगाने की बात नहीं करते। हालांकि, ज्यादा उत्सर्जन वाले मॉडल कंपनियों के लिए अनुपालन की दृष्टि से महंगे हो सकते हैं।

डीजल वाहनों को मिलने वाले प्रोत्साहन और उनकी उत्सर्जन स्थिति के कारण कंपनियां भविष्य में अपने पोर्टफोलियो में पेट्रोल, हाइब्रिड, EV और वैकल्पिक ईंधन वाले वाहनों का हिस्सा बढ़ा सकती हैं। इसका असर लंबे समय में डीजल कारों की कीमत और बिक्री रणनीति पर पड़ सकता है।

सरकार का बड़ा लक्ष्य क्या है?

नई CAFE व्यवस्था के पीछे सरकार का व्यापक लक्ष्य ईंधन की खपत और तेल आयात पर निर्भरता कम करना, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को घटाना है। यह भारत के दीर्घकालिक जलवायु लक्ष्यों और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने की दिशा से भी जुड़ा हुआ है।

हालांकि, यह अभी ड्राफ्ट है। अंतिम नियम लागू होने से पहले इसमें बदलाव संभव हैं। इसलिए कार खरीदारों के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 2027 से ऑटो कंपनियों की नई कार रणनीति में EV, हाइब्रिड, फ्लेक्स-फ्यूल और बेहतर ईंधन दक्षता वाले मॉडल की भूमिका बढ़ सकती है।

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