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राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर हबासपुरी वीविंग डॉक्यूमेंट्री का पोस्टर जारी, ओडिशा की लुप्त होती बुनाई परंपरा को मिलेगी वैश्विक पहचान

📅 09 अगस्त 2026

भुवनेश्वर, 9 अगस्त। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर ओडिशा की पारंपरिक हथकरघा विरासत को वैश्विक मंच तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई। इस मौके पर ओडिशा के कालाहांडी जिले की संकटग्रस्त हबासपुरी हथकरघा परंपरा पर आधारित डॉक्यूमेंट्री ‘हबासपुरी वीविंग: द सेकेंड एंड लास्ट डेथ???’ का आधिकारिक पोस्टर जारी किया गया।

इस डॉक्यूमेंट्री का निर्माण रितुप्रिया प्रोडक्शंस ने बीएनआर फिल्म्स और एमएनएम एंटरटेनमेंट के सहयोग से किया है। फिल्म का निर्माण पुरस्कार विजेता फिल्मकार अतिश कुमार राउत ने किया है, जबकि इसके निर्देशन की जिम्मेदारी बिस्वनाथ रथ और मयूर महापात्र ने संभाली है।

हबासपुरी बुनाई के इतिहास और संकट की कहानी

डॉक्यूमेंट्री का मुख्य केंद्र कालाहांडी की प्रसिद्ध हबासपुरी बुनाई कला है। यह पारंपरिक हथकरघा शैली अपनी विशिष्ट पहचान के बावजूद बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश के कारण लगातार चुनौतियों का सामना कर रही है।

फिल्म में हबासपुरी बुनाई के इतिहास, पारंपरिक तकनीकों, स्थानीय बुनकरों के जीवन और उनके सामने खड़ी आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं को करीब से दिखाने का प्रयास किया गया है। साथ ही यह सवाल भी उठाया गया है कि आधुनिक औद्योगिकीकरण के दौर में इस विरासत को किस तरह संरक्षित किया जा सकता है।

‘कोटपाड़ वीविंग’ के बाद आगे बढ़ी कहानी

‘हबासपुरी वीविंग’ को निर्देशक बिस्वनाथ रथ की चर्चित डॉक्यूमेंट्री ‘कोटपाड़ वीविंग: द स्टोरी ऑफ ए रेस अगेंस्ट टाइम’ की वैचारिक अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

इससे पहले उनकी डॉक्यूमेंट्री को देश-विदेश में व्यापक पहचान मिली थी। फिल्म को 60 पुरस्कार और सम्मान मिलने के साथ 11 देशों में प्रदर्शित किए जाने की जानकारी दी गई है। इसके जरिए ओडिशा की पारंपरिक बुनाई और उससे जुड़े समुदायों के मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाया गया था।

2019 से शुरू हुआ शोध कार्य

‘हबासपुरी वीविंग’ के लिए शोध कार्य वर्ष 2019 में शुरू हुआ था और 2024 तक अलग-अलग चरणों में जारी रहा। शुरुआती शोध अगस्त 2019 में बिस्वनाथ रथ, वस्त्र डिजाइनर अनुप्रिया मृधा और अमेरिका स्थित पुस्तकालय निदेशक कोरिन फ्लेहर्टी ने शुरू किया था।

कोविड-19 महामारी के कारण इस काम में कुछ समय के लिए रुकावट आई। बाद में अगस्त 2023 में शोध को फिर से आगे बढ़ाया गया। इस चरण में मयूर महापात्र, सिद्धांत स्वरूप और देबाशीष प्रतिहारी ने भी शोध कार्य में योगदान दिया। निर्माण टीम के मुताबिक, लंबे समय तक किए गए शोध ने डॉक्यूमेंट्री को ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों के साथ गहराई देने में मदद की है।

कान फिल्म महोत्सव में भी सामने आया था पहला लुक

डॉक्यूमेंट्री को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने का सिलसिला पहले ही शुरू हो चुका है। वर्ष 2023 में आयोजित एनएफडीसी फिल्म बाजार डॉक्यूमेंट्री को-प्रोडक्शन मार्केट में 98 अंतरराष्ट्रीय प्रविष्टियों में से इस परियोजना को अंतिम 12 डॉक्यूमेंट्री प्रोजेक्ट प्रस्तावों में जगह मिली थी।

इसके अलावा फिल्म का पहला लुक पोस्टर 77वें कान फिल्म महोत्सव में जारी किया गया था। अंतरराष्ट्रीय मंच पर हबासपुरी हथकरघा परंपरा को प्रस्तुत किए जाने को ओडिशा की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में अहम कदम माना गया।

फिल्म से जुड़े कलाकार और तकनीकी टीम

डॉक्यूमेंट्री की सह-निर्माता सुप्रिया राउत हैं। सिद्धांत स्वरूप मुख्य सहायक निर्देशक और देबाशीष प्रतिहारी सहायक निर्देशक की भूमिका में हैं। मयूर महापात्र ने छायांकन निर्देशक की जिम्मेदारी संभाली है, जबकि दिलेश्वर प्रधान ध्वनि डिजाइन से जुड़े हैं।

फिल्म के संपादन और डीआई का काम अजित नारायण दाश ने किया है। वहीं पृष्ठभूमि संगीत चर्चित संगीतकार प्रियब्रत पाणिग्राही तैयार कर रहे हैं।

फिल्म समारोहों के बाद ओटीटी और डिजिटल रिलीज की तैयारी

निर्माण टीम के अनुसार, ‘हबासपुरी वीविंग’ को भारत और विदेशों के विभिन्न फिल्म समारोहों में प्रदर्शित करने की योजना है। फिल्म समारोहों के बाद इसे टेलीविजन, ओटीटी और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्शकों के लिए उपलब्ध कराने की तैयारी की जा रही है।

बीएनआर फिल्म्स फिल्म की अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल रणनीति और डिजिटल वितरण से जुड़े कार्यों को संभालेगी। इसका उद्देश्य डॉक्यूमेंट्री को ओडिशा और भारत से आगे अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाना है।

स्थानीय कहानी को वैश्विक मंच देने की कोशिश

निर्माता अतिश कुमार राउत ने कहा कि हबासपुरी जैसी विशिष्ट और लगभग विलुप्ति की ओर बढ़ रही हथकरघा परंपरा के पुनर्जीवन से जुड़ी परियोजना का हिस्सा बनना उनके लिए महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, स्थानीय कहानियों को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाना रितुप्रिया प्रोडक्शंस की प्रमुख सोच रही है।

निर्देशक बिस्वनाथ रथ के मुताबिक, वर्ष 2019 से चल रही यह परियोजना उनकी टीम के लिए व्यक्तिगत रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने कहा कि हबासपुरी बुनाई बेहद खूबसूरत होने के बावजूद व्यापक स्तर पर अभी कम जानी जाती है और इसे संरक्षण, पहचान तथा सम्मान की जरूरत है।

वहीं निर्देशक मयूर महापात्र ने कहा कि फिल्म ऐसे बुनकर समुदाय की कहानी सामने लाने का प्रयास करती है, जिसकी पारंपरिक कला बदलते समय के साथ प्रभावित हो रही है। औद्योगिकीकरण, आर्थिक चुनौतियां और सामाजिक बदलाव इस कला के सामने बड़ी मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं।

हबासपुरी विरासत को बचाने का सवाल

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर डॉक्यूमेंट्री का पोस्टर जारी होना सिर्फ एक फिल्म की प्रचार गतिविधि नहीं माना जा रहा है। इसके जरिए ओडिशा की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत और उससे जुड़े बुनकर समुदाय की स्थिति को चर्चा के केंद्र में लाने की कोशिश की गई है।

हबासपुरी बुनाई की कलात्मक पहचान के साथ इसे पीढ़ियों से जीवित रखने वाले कारीगरों का संघर्ष भी इस डॉक्यूमेंट्री का अहम हिस्सा है। ऐसे समय में जब पारंपरिक हथकरघा कलाएं आधुनिक बाजार और बदलती जीवनशैली के दबाव का सामना कर रही हैं, ‘हबासपुरी वीविंग’ जैसी परियोजनाएं इन विरासतों के संरक्षण की जरूरत को सामने लाती हैं।

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